गुरुवार, 21 सितंबर 2017

इम्तिहान भी तय है

मान-अपमान भी तय है ,वितृष्णा भरी आँख का सामान भी तय है 
न भटकना ऐ दिल , तुझको सहना है जो वो तूफ़ान भी तय है 

न राहों से गिला , न कश्ती से शिकायत मुझको 
तूफानों के समन्दर में , मेरा इम्तिहान भी तय है 

डूबेंगे कि लग पायेंगे किनारे से हम  
है किसको पता ,मगर अपना अन्जाम भी तय है 

मत बाँध इन किनारों में ऐ खुदा मुझको 
मंजिल-ऐ-मक़्सद के लिये , रूहे-सुकून का अरमान भी तय है 

थोड़ी धूप , थोड़ी छाँव ओढ़ कर घर से निकले 
सफर में जो सामान बटोरा , सर पे बोझ से ढलान भी तय है 

सोमवार, 14 अगस्त 2017

जन्माष्टमी पर

आज फुर्सत में हूँ मैं ,कहाँ हो बोलो प्यारे 
तुमसे हैं बातें करनी,आ जाओ कान्हा प्यारे    

सदियों से देखें रस्ता ,ये आँखें जागी-जागी 
राह में ऐसे लगीं हैं , जैसे हों कोई अभागी 
मुरली की तान सुनाने ,कुछ मेरी भी सुन जाने 
आ जाओ कान्हा प्यारे 

गये तुम कौन गली हो ,तुम्हारे बिन हैं अधूरे 
श्याम तुम अन्तर्यामी ,दूर क्यों खड़े निहारो 
चल रहे सँग हमारे , सदा तुम बाहें थामे 
आ जाओ कान्हा प्यारे 

पहाड़ टूटा तो नहीं है ,नहीं है शिकायत करनी 
किसमें है मेरी भलाई ,प्रभु तू बेहतर जाने 
मगर मुझको आजमाने , फिर इक बार मुझे समझाने 
आ जाओ कान्हा प्यारे  

आज फुर्सत में हूँ मैं ,कहाँ हो बोलो प्यारे 
तुमसे हैं बातें करनी,आ जाओ कान्हा प्यारे 



गुरुवार, 27 जुलाई 2017

किसी आँच का धुआँ

ये मेरे साथ चल रहा है किसी आँच का धुआँ 
इतनी बदली हुई फ़िज़ाँ है के होशो-हवास में नहीं है समां 

ऐ वक़्त , इस ज़िल्लत का शुक्रिया ,
ये पीड़ा जो मुझे ले आई है कसक के इस मुकाम तक 
सीखा गई है जीना , टूट जाने तलक 

ज़िन्दगी ने बड़ी भारी कीमत माँगी है 
जो राह पहुँचाती है ज़िन्दगी तक , उसकी ही आहुति माँगी है 

चेहरों के पीछे का सच ,ये तुझको होगा मालूम 
मैंने नियति के आगे घुटने नहीं टेके 
सिर्फ नियति से लय मिलाने की कोशिश की है 

रविवार, 4 दिसंबर 2016

इक बेहतर कल का निर्माण चल रहा है

ये देश बदल रहा है , इतिहास रच रहा है 
गाँधी के सपनों का भारत , करवट बदल रहा है 

थोड़ी सी कस है खानी , थोड़ी सी परेशानी 
अपने हितों से बढ़ कर , पहचानो है देश प्यारा 
आओ हम आहुति दें , इक बेहतर कल का निर्माण चल रहा है 
ये देश बदल रहा है 

उग्रवाद , कालाबाजारी और जाली नोटों का धन्धा 
कर रहे थे प्रहार नींव पर ही ,भ्रष्टाचार से त्रस्त थे 
विमुद्रीकरण ही हल था , काला धन निकल रहा है 
ये देश बदल रहा है 

अब न पसारे हाथ कोई , न हों भूखे बच्चे गली-गली 
ओत-प्रोत हो मानवता , अच्छे दिनों का आगाज़ 
इक उजली सी  सुबह का सूरज निकल रहा है 
ये देश बदल  रहा है 

बुधवार, 1 जून 2016

सौदा खरा चाहिये

दिल के बदले दिल चाहिये
हमको सौदा खरा चाहिये

मुश्किल नहीं है बहुत
हमको रिश्ता सगा चाहिये

आहें ही बसती रहीं
दिल दुआ से भरा चाहिये

जी भर के रो लें मगर
तेरा काँधा जरा चाहिये

पतझड़ के मौसम में भी
दिल हमको खिला चाहिये 

लाइये , शेख जी लाइये 
हमको मौसम हरा चाहिये 


गुरुवार, 10 मार्च 2016

गुलाब सा चेहरा

गुलाब को उसके काँटों की वजह से मत छोड़ो 
अवगुणों की वजह से गुणों को मत छोड़ो 

गुजारा है जो वक़्त साथ-साथ , वो बोलता ही मिलेगा 
खुशबुएँ साथ-साथ चलती हैं ,
वरना दिल तन्हा ही मिलेगा 
सारी खरोंचें जायेंगी भर ,गुलाब सा चेहरा दमकता ही मिलेगा 

गुलाब को उसके काँटों की वजह से मत छोड़ो 
अवगुणों की वजह से गुणों को मत छोड़ो

रुकना नहीं है वक़्त ने ,ये तू भी देख ले 
हर आज बना कल , और कल का क्या वज़ूद 
जो चीज कीमती है , गई हाथों से यूँ फिसल 
भर ले उसे सीने में , खुशबू सा समां महकता ही मिलेगा 

गुलाब को उसके काँटों की वजह से मत छोड़ो 
अवगुणों की वजह से गुणों को मत छोड़ो







बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

सफ़्हा-दर -सफ़्हा

ऐसे उठ आये तेरी गली से हम
जैसे धूल झाड़ के कोई उठ जाता है

यादों की गलियों में थे अँधेरे बहुत
वक़्त भी आँख मिलाते हुए शर्माता है

वक़्ते-रुख्सत न आये दोस्त भी
गिला दुनिया से भला क्या रह जाता है

लाये थे जो निशानियाँ वक़्ते-सफर की
रह-रह कर माज़ी उन्हें सुलगाता है 

अब मेरे हाथ लग गया अलादीन का चराग 
आतिशे-ग़म से भी अँधेरा छँट जाता है 

तय होता है लेखनी का सफ़र सफ़्हा-दर -सफ़्हा 
मील का हर पत्थर हमें समझाता है